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पितृ पक्ष 2018: अगर आपके मन में बच्चों के मृत्योपरांत कर्म कांड को लेकर कोर्इ है भ्रम, तो जाने श्राद्ध से जुड़ी खास बातें

पितृ पक्ष 2018: अगर आपके मन में बच्चों के मृत्योपरांत कर्म कांड को लेकर कोर्इ है भ्रम, तो जाने श्राद्ध से जुड़ी खास बातें

बच्चों के श्राद्ध को लेकर अक्सर ये ऊहापोह रहती है कि उनका श्राद्ध होता है या नहीं, यदि होता है तो किस उम्र तक के बच्चे श्राद्ध के दायरे में आते हैं आैर जिनका श्राद्ध नहीं होता उनकी आैर कौन सी क्रियायें की जाती हैं। इस बारे में सबसे पहले तो ये जान लें की बच्चों के श्राद्ध की प्रक्रिया में उम्र की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। मृतक बच्चे की उम्र के अनुसार ही ये तय होता है कि उसका श्राद्ध होगा या नहीं। जिनका श्राद्ध नहीं होता है उनमें से कुछ के साथ कुछ विशेष विधान करें जाते हैं। 

जिन बच्चों की आयु दो वर्ष या उससे कम होती है उनका श्राद्ध या वार्षिक तिथि का विधान नहीं होता है। दस वर्ष से कम आयु की कन्याआें के साथ भी यही नियम लागू होता है। उनका भी श्राद्ध आैर वार्षिक तिथि करने की मनाही है। यदि बालक की आयु छह वर्ष से अधिक आैर कन्या की आयु दस वर्ष के करीब है तो इनका श्राद्ध तो नहीं होता परंतु उनकी मलिन षोडशी क्रिया की जाती है। मलिन षोडशी मृत्यु के दस के भीतर मृत्युपरांत की जाने वाली क्रिया को कहा जाता है। 

इसके पश्चात जिन बालकों आयु छह वर्ष से ऊपर की होती है उनकी मृत्युपरांत श्राद्ध की सम्पूर्ण क्रियायें विधिविधान के साथ की जाती हैं।  कन्याआें की दस साल से ज्यादा की उम्र में श्राद्ध प्रक्रिया होती है। इनमें मलिन षोडशी, एकादशाह आैर सपिंडन जैसी क्रियायें शामिल हैं। यदि तिथि याद ना रहे तो मृत बच्चों का श्राद्ध करने के लिए भी तेरहवीं के दिन को शुभ माना जाता है

विशेष रूप से जिन कन्याआें का विवाह हो चुका हो उनका श्राद्ध करने का अधिकार उसके सुसराल वालोें को होता है मायके में माता पिता को नहीं। वैसे किशोर हो चुके अविवाहितों का श्राद्ध पंचमी के दिन भी किया जा सकता है। इसी लिए इसे कुंवारा पचमी भी कहते हैं। 

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